डाक्टर नसीम अशरफ

दुनिया भर में दांत और मसूड़ों की बीमारियों से पीड़ित रोगियों की सबसे ज़्यादा तादाद भारत में हैं। आंकड़े बताते हैं कि दक्षिण एशिया के तमाम ग़रीब और पिछड़े देशों के मुक़ाबले दांतों को लेकर सबसे ज़्यादा लापरवाह भारतीय है। विशेषज्ञों के अनुसार जबतक रोग बेहद जटिल न हो जाए और दर्द सहने की सीमा से बाहर न चला जाए, तबतक भारतीय दंत चिकित्सक के पास नहीं जाते। दांतों की देखभाल में लापरवाही का ख़मियाज़ा उनको लंबी अवधि में भुगतना पड़ता है।

चिकित्सा विज्ञानियों का मानना है कि व्यक्ति की सेहत के लिए उसके दांत और मसूड़ों का स्वस्थ्य रहना बेहद ज़रूरी है। दरअसल अच्छी सेहत के लिए अच्छा और पौष्टिक भोजन ही नहीं, बल्कि उस भोजन को ठीक से जबाकर खाना भी ज़रूरी है। लेकिन अगर दांत और मसूड़ों में इन्फेक्शन, यानी रोग लगा हो तो भोजन ठीक से चबा कर खा पाना तक़रीबन नामुमकिन है। हालांकि इसका एक दूसरा पहलू भी है। अगर आप ठीक से भोजन नहीं कर रहे हैं और शरीर को पौष्टिक तत्व नहीं मिल रहे हैं तो इसका आपके दांत और मसूड़ों की सेहत पर बेहत बुरा असर पड़ता है। देखा जाए तो शरीर की सेहत के लिए दांत और मसूड़ों का स्वास्थ्य रहना ही आवश्यक नहीं है बल्कि सेहतमंद दांतों के लिए शारिरिक स्वास्थ्य भी उतना ही आवश्यक है।

Dental Surgery 2132

आंकड़े बताते हैं कि भारतीय न सिर्फ अपनी सेहत बल्कि दांतों की देखभाल करने के मामले में बेहद लापरवाह हैं। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की तरफ से प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, औसतन प्रति एक लाख व्यक्ति, 31,489 भारतीय दांत या मसूड़ों के किसी न किसी रोग का शिकार हैं। यह दक्षिण एशिया के बाक़ी देशों (औसतन 30,903 प्रति एक लाख व्यक्ति) के मुक़ाबले में भी ख़राब है। देखा जाए तो दक्षिण एशियाई देशों में भारत आर्थिक तौर पर पाकिस्तान, अफग़ानिस्तान, श्रीलंका, मालदीव, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान से बेहतर हालत में हैं। मगर दंत स्वास्थ्य के मामले में भारतीय इन देशों से भी पीछे हैं और यह चिंता की बात है। दांतों की देखभाल में लापरवाही की भारी क़ीमत हमें चुकानी पड़ती है।

लापरवाही के अलावा अच्छे दंत चिकित्सकों की कमी भी देश में एक बड़ी समस्या है। आंकडों के मुताबिक़ देश भर की सरकारी सेवाओँ में महज़ एक लाख 76 हज़ार दंत चिकित्सक हैं। निजी प्रेक्टिक करने वालों में भी दांतों के डाक्टर के नाम पर एक बड़ी तादाद झोलाछाप या अर्ध प्रशिक्षित डेंटिस्टों की है। इसके चलते औसतन हर तीसरा भारतीय दांतों की किसी न किसी बीमारी से ग्रसित है। दांत और मसूड़ों के स्वास्थ्य को लेकर बरती गई लापरवाही भारतीयों को काफी महंगी पड़ती है। शुरुआत में बीमारी की अनदेखी करने वालों को न सिर्फ दांतों से हाथ धोना पड़ता है बल्कि उनका मेडिकल बिल भी काफी बड़ा हो जाता है। दांतों की देखभाल में लापरवाही के चलते उनकी जीवन भर की कमाई अस्पतालों में चली जाती है और बहुत से लोग इसी वजह से आर्थिक तौर पर कमज़ोर हो जाते हैं।

तो इस समस्या का हल क्या है? विशेषज्ञ कहते हैं कि हमें कम से कम दो महीने में एक बार किसी अच्छे डेंटिस्ट को अपने दांत और मसूड़े अवश्य दिखा देने चाहिएं। इसके दो फायदे होते हैं। एक तो हमारे दांत और मसूड़े स्वास्थ्य रहते हैं। दूसरे, दांतों के इन्फेक्शन की वजह से होने वाली पेट और दिल की बीमारी का ख़तरा भी कम होता है। देखा जाए तो इस तरह के मासिक या द्विमासिक जांच पर हम औसतन 200 से 300 रुपये प्रतिमाह ख़र्च करते हैं लेकिन यह एक प्रकार से स्वास्थय का बीमा है। इस तरह हम दस साल में 2500 से 3000 हज़ार रुपये ख़र्च करते हैं। लेकिन एक दांत का इम्पलांट ही देखा जाए तो इससे महंगा है।

फिर ये भी जान लीजिए कि कोई भी दांत आपके असली दांतों की जगह नहीं ले सकता। इसलिए अपने डेंटिस्ट से मिलते रहिए। दांतों की दूसरी समस्याओँ को जानने के लिए हमारा ब्लॉग पढ़ते रहिए। दांतों की किसी भी बीमारी की जांच और परामर्श के लिए आप मेरा डेंटल क्लीनिक, जसोला, नई दिल्ली से भी संपर्क कर सकते हैं।

Share this post